छठ 2026 कब है — चारों दिन एक नज़र में
छठ कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पड़ता है — दीवाली के ठीक छह दिन बाद। यानी जब नवरात्रि और दीवाली की रौनक ढल चुकी होती है, तब पूर्वी भारत का सबसे बड़ा पर्व शुरू होता है। इसीलिए इसका नाम छठ है: षष्ठी से छठ।
ध्यान दीजिए कि छठ में "मुहूर्त" जैसी कोई चीज़ नहीं होती, जैसी बाक़ी पूजाओं में होती है। यहाँ घड़ी पंडित नहीं, सूरज ख़ुद तय करता है। आपके शहर में जिस वक़्त सूरज डूबेगा, वही आपका संध्या अर्घ्य का समय है। जिस वक़्त उगेगा, वही उषा अर्घ्य का। इसीलिए आगे हमने शहर-दर-शहर का समय दिया है।
नाम में ही पूरी बात छिपी है — छठी मैया कौन हैं?
यह वह सवाल है जिसका जवाब सबसे कम मिलता है, और जो जान लेने के बाद पूरा व्रत अलग तरह से समझ आता है।
छठी मैया कोई अलग-थलग लोक-देवी नहीं हैं। शास्त्रों में उन्हें षष्ठी देवी कहा गया है — ब्रह्मा की मानस पुत्री, और सूर्य की बहन। उन्हें उषा यानी भोर का रूप भी माना जाता है, वही वैदिक उषा जिसकी स्तुति ऋग्वेद में मिलती है।
अब वह जोड़ जो सब कुछ खोल देता है। हमारे यहाँ बच्चे के जन्म के छठे दिन जो पूजा होती है — जिसे "छठी" कहते हैं — वह इन्हीं षष्ठी देवी की होती है। वे नवजात की रक्षक हैं, संतान देने वाली और उसकी आयु बढ़ाने वाली।
यानी छठ का व्रत जिस देवी के लिए रखा जाता है, वे वही हैं जो आपके बच्चे के जन्म के छठे दिन उसके सिरहाने आई थीं। यह व्रत माँगता कुछ और नहीं — संतान की आयु माँगता है। इसीलिए इसे रखने वाली औरत भूख-प्यास की गिनती नहीं करती।
कथाओं में छठ को महाभारत से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि कर्ण, जो स्वयं सूर्यपुत्र थे, कमर तक पानी में खड़े होकर अपने पिता को अर्घ्य देते थे — और आज भी हर व्रती वही मुद्रा दोहराती है। एक और कथा में द्रौपदी और कुंती को सूर्य की उपासना करते बताया गया है। इन कथाओं को इतिहास की तरह मत लीजिए; इन्हें उस तरह लीजिए जैसे परिवार में कोई पुरानी बात पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती है।
दिन 1 — नहाय-खाय (शुक्रवार, 13 नवंबर)
छठ की शुरुआत पूजा से नहीं, सफ़ाई से होती है। और यह सफ़ाई ऐसी होती है जैसी साल में और कभी नहीं होती।
व्रती सुबह नदी, तालाब या घर पर ही स्नान करती है। फिर पूरा घर — रसोई, आँगन, घाट तक का रास्ता — धोया जाता है। इसके बाद बनता है वह खाना जिसका नाम ही इस दिन को मिला है: लौकी की सब्ज़ी, चने की दाल और अरवा चावल। मिट्टी के चूल्हे पर, आम की लकड़ी से, नए या अलग रखे बर्तनों में। न प्याज़, न लहसुन, न बासी कुछ।
यह भोजन पहले छठी मैया को अर्पित होता है, फिर व्रती खाती है, और उसके बाद घर के बाक़ी लोग। यही व्रती का आख़िरी पूरा भोजन है — इसके बाद अगले तीन दिन तक जो भी है, वह अनुशासन है।
💡 एक बात जो कम लोग बताते हैं: छठ में व्रत रखने वाले को व्रती या परवैतिन कहते हैं। और यह सिर्फ़ महिलाओं का व्रत नहीं है — पुरुष भी रखते हैं, और कई परिवारों में पीढ़ियों से रखते आए हैं। जिस घर में जिसने एक बार शुरू कर दिया, परंपरा कहती है कि वह उसे जीवनभर निभाए और फिर अगली पीढ़ी को सौंपे।
दिन 2 — खरना (शनिवार, 14 नवंबर)
यह वह दिन है जिस पर पूरा व्रत टिका है — और जिसे बाहर के लोग सबसे कम समझते हैं।
खरना के दिन व्रती सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूरा उपवास रखती है, बिना अन्न और बिना जल। शाम को, सूर्य ढलने के बाद, मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर बनती है — गुड़, अरवा चावल और दूध से। साथ में रोटी और फल।
यहाँ एक तुलना समझने लायक़ है — हरतालिका तीज का निर्जला व्रत 24 घंटे का होता है, छठ का 36 घंटे का। और तीज में व्रती घर पर रहती है, जबकि छठ में उसे दो बार ठंडे पानी में उतरना पड़ता है।
पूजा के बाद व्रती यह खीर खाती है। घर में उस समय पूरी चुप्पी रखी जाती है — कहा जाता है कि व्रती के खाते समय कोई आवाज़ न हो। और जैसे ही वह खाना ख़त्म करती है, उसी क्षण से शुरू हो जाता है 36 घंटे का निर्जला व्रत।
छत्तीस घंटे। न एक कौर, न एक घूँट। इस बीच वह एक शाम, एक पूरी रात, एक पूरा दिन और एक और रात गुज़ारेगी — और उसके बीच में दो बार कमर तक ठंडे पानी में खड़ी भी होगी। जिन घरों में यह होता है, वे जानते हैं कि उन दो रातों में घर का हर सदस्य कैसे जगता है।
खरना की खीर पड़ोस में भी बाँटी जाती है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के घरों में यह शाम अपने आप में एक छोटा त्योहार होती है — और कई लोगों की बचपन की सबसे पक्की याद यही खीर है।
ठेकुआ — वह प्रसाद जिसके बिना छठ अधूरा है
अगर छठ का कोई एक स्वाद है, तो वह ठेकुआ है।
बनता यह बहुत सादा है — गेहूँ का आटा, गुड़ और घी। पर बनाने का तरीक़ा साधारण नहीं है। जिस दिन ठेकुआ बनता है, उस दिन रसोई किसी मंदिर से कम नहीं होती। नहाकर, साफ़ कपड़े पहनकर, बिना कुछ चखे। कहीं-कहीं तो आटा पीसने के लिए अलग चक्की रखी जाती है।
बनाने की विधि छोटी है: गुड़ को पानी में घोलकर छान लीजिए, उसमें थोड़ी सौंफ और घी का मोयन डालकर गेहूँ का आटा गूँथिए — आटा सख़्त रहना चाहिए, रोटी जैसा नरम नहीं। छोटी लोई बनाकर लकड़ी के साँचे में दबाइए, और धीमी आँच पर घी में सुनहरा होने तक तलिए। धीमी आँच ही असली राज़ है; तेज़ आँच पर ऊपर से रंग आ जाएगा और भीतर कच्चा रह जाएगा।
🌿 ठेकुआ इतना ज़रूरी क्यों? इसमें कुछ भी जल्दी ख़राब होने वाला नहीं है — न दूध, न खोया। यह हफ़्तों चलता है, और यही इसे उस समय का सबसे व्यावहारिक प्रसाद बनाता था जब घाट दूर होते थे और फ़्रिज नहीं होते थे। परंपरा में अक्सर श्रद्धा और समझदारी साथ-साथ चलती हैं।
छठ पूजा की सामग्री — पूरी सूची
छठ की सामग्री देखकर एक बात तुरंत समझ आती है: इसमें कुछ भी बना-बनाया नहीं है, कुछ भी प्लास्टिक में नहीं है। बाँस, मिट्टी, पीतल, पत्ते और खेत की उपज — बस इतना।
एक चीज़ पर ख़ास ध्यान दीजिए — छठ में सिंदूर नारंगी रंग का चढ़ता है, लाल नहीं, और व्रती इसे नाक से माँग तक लंबा लगाती है। यह छठ की अपनी पहचान है।
इनमें कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिनका अपना अर्थ है। बाँस का सूप और दउरा — बाँस को वंश-वृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसीलिए संतान के इस व्रत में यही पात्र चुना गया। गन्ना कार्तिक की नई फ़सल है, यानी अर्घ्य में वही चढ़ रहा है जो अभी-अभी धरती ने दिया। सूखा नारियल लंबे समय तक बचता है और उसे संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
और एक बात जो आज के समय में और भी क़ीमती लगती है — छठ में कोई मूर्ति नहीं बनती, इसलिए कोई विसर्जन नहीं होता। न प्लास्टर, न रंग, न पानी में घुलने वाला कुछ भी। पर्यावरण की भाषा में कहें तो यह भारत का सबसे साफ़ त्योहार है, और यह बात किसी ने बाद में नहीं जोड़ी — यह शुरू से ऐसा ही है।
दिन 3 — संध्या अर्घ्य (रविवार, 15 नवंबर)
यह छठ का हृदय है। और शायद भारत का सबसे सुंदर दृश्य।
दोपहर से ही घर में सूप सजने लगते हैं। शाम ढलते-ढलते पूरा परिवार दउरा सिर पर उठाकर घाट की ओर चलता है — और यह बोझ आमतौर पर घर का कोई पुरुष उठाता है, नंगे पाँव। रास्ते में गीत चलते रहते हैं।
घाट पर व्रती कमर तक पानी में उतरती है, पश्चिम की ओर मुँह करके। हाथ में पीतल का लोटा, उसमें जल और दूध। और जब सूरज क्षितिज को छूने लगता है, वह उसे अर्घ्य देती है — उस सूरज को जो जा रहा है।
सोचिए इस विचार को। हम सब उगते सूरज को नमस्कार करना जानते हैं — जो चढ़ रहा हो, जो सफल हो रहा हो, जिसकी रोशनी बढ़ रही हो। छठ पहले उसे प्रणाम करता है जो ढल रहा है। जो थक चुका है। जिसका दिन पूरा हो गया। यह पर्व कहता है कि जो जा रहा है, उसका आभार पहले — क्योंकि उसी ने दिनभर हमें रखा है।
अर्घ्य के बाद व्रती वहीं खड़े-खड़े छठी मैया से प्रार्थना करती है। कुछ लोग घाट तक दंडवत करते हुए आते हैं — ज़मीन पर लेटकर, फिर उठकर, फिर लेटकर। यह मन्नत पूरी होने पर किया जाता है।
घाट पर वह होता है जो और कहीं नहीं होता
यहाँ एक बात कहनी ज़रूरी है, जो इस पर्व को बाक़ी सबसे अलग करती है।
छठ में न कोई पुरोहित होता है, न मूर्ति, न मंदिर। व्रती ख़ुद पानी में खड़ी होकर सीधे सूर्य को अर्घ्य देती है — बीच में कोई नहीं। कोई मंत्र किसी से पूछना नहीं पड़ता, कोई दक्षिणा नहीं देनी पड़ती, किसी की अनुमति नहीं चाहिए।
और इसका सीधा असर घाट पर दिखता है। जिस पानी में गाँव के सबसे बड़े घर की औरत खड़ी है, उसी पानी में दो क़दम दूर मज़दूर की पत्नी भी खड़ी है। दोनों का सूरज एक है, दोनों का सूप एक जैसा है, दोनों के लिए कोई अलग क़तार नहीं है। साल में यह एक शाम ऐसी होती है जब घाट पर जाति और हैसियत पानी में घुल जाती है।
कोसी भरना — रात का सबसे सुंदर दृश्य
संध्या अर्घ्य के बाद, जिन घरों में कोई मन्नत पूरी हुई हो — बच्चा हुआ हो, शादी हुई हो, कोई बड़ी बीमारी टली हो — वहाँ रात में कोसी भरी जाती है।
आँगन में पाँच गन्ने खड़े करके ऊपर से बाँध दिए जाते हैं, जिससे एक छोटा मंडप बनता है। उसके नीचे मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं, हाथी के आकार के मिट्टी के पात्र रखे जाते हैं, और फल-प्रसाद सजाया जाता है। परिवार वहीं बैठकर गीत गाता है।
अगली सुबह यही कोसी घाट पर ले जाकर फिर से भरी जाती है। जो लोग इसे पहली बार देखते हैं, वे अक्सर यही कहते हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ पहले नहीं देखा — अँधेरे आँगन में सिर्फ़ दीयों की रोशनी और धीमे गीत।
दिन 4 — उषा अर्घ्य और पारण (सोमवार, 16 नवंबर)
अभी अँधेरा है। शायद चार बजे हैं। ठंड है, कार्तिक की। और घाट पर फिर भीड़ है।
व्रती फिर पानी में उतरती है, इस बार पूर्व की ओर मुँह करके। और जैसे ही क्षितिज पर लाली फूटती है, वही सूप फिर ऊपर उठता है। उगते सूरज को अर्घ्य — छत्तीस घंटे बाद।
इसके बाद पारण। परंपरा में व्रत अदरक और गुड़ खाकर तोड़ा जाता है, फिर थोड़ा जल, फिर प्रसाद। और तब पूरा घर एक साथ बैठकर ठेकुआ खाता है, पड़ोस में बाँटता है।
🍵 पारण की व्यावहारिक समझ: छत्तीस घंटे बाद पहला निवाला भारी नहीं होना चाहिए। पहले थोड़ा जल, फिर अदरक-गुड़ या नींबू-पानी, फिर हल्का प्रसाद — और थोड़ी देर बाद ही असली भोजन। एकदम से पूरा खाना खा लेने पर कई व्रतियों को उल्टी या चक्कर की शिकायत हो जाती है। यह श्रद्धा का नहीं, शरीर के काम करने के तरीक़े का मामला है।
अपने शहर में अर्घ्य का समय
छठ में समय पंचांग से नहीं, आपके अपने आकाश से तय होता है। नीचे 15 नवंबर के सूर्यास्त और 16 नवंबर के सूर्योदय के समय दिए हैं — यही आपके संध्या और उषा अर्घ्य के समय हैं। साथ में 14 नवंबर का सूर्यास्त भी, क्योंकि खरना का उपवास उसी समय खुलता है।
| शहर | खरना — 14 नव सूर्यास्त | संध्या अर्घ्य — 15 नव सूर्यास्त | उषा अर्घ्य — 16 नव सूर्योदय |
|---|---|---|---|
| पटना | 5:03 शाम | 5:03 शाम | 6:09 सुबह |
| मुज़फ़्फ़रपुर | 5:01 शाम | 5:01 शाम | 6:09 सुबह |
| गया | 5:05 शाम | 5:04 शाम | 6:08 सुबह |
| रांची | 5:06 शाम | 5:05 शाम | 6:04 सुबह |
| वाराणसी | 5:12 शाम | 5:12 शाम | 6:17 सुबह |
| लखनऊ | 5:18 शाम | 5:17 शाम | 6:28 सुबह |
| नई दिल्ली | 5:30 शाम | 5:29 शाम | 6:45 सुबह |
| कोलकाता | 4:55 शाम | 4:54 शाम | 5:51 सुबह |
| मुंबई | 6:02 शाम | 6:02 शाम | 6:48 सुबह |
| अहमदाबाद | 5:57 शाम | 5:57 शाम | 6:55 सुबह |
| हैदराबाद | 5:42 शाम | 5:42 शाम | 6:23 सुबह |
| बेंगलुरु | 5:52 शाम | 5:51 शाम | 6:20 सुबह |
| काठमांडू, नेपाल | 5:14 शाम | 5:13 शाम | 6:26 सुबह |
समय हर शहर के अक्षांश-देशांतर से खगोलीय गणना द्वारा निकाले गए हैं। बड़े शहर में जगह-जगह एक-दो मिनट का अंतर रह सकता है। घाट पर हमेशा दिए गए समय से 30–40 मिनट पहले पहुँचिए — भीड़ में जगह बनाने और सूप सजाने में उतना समय लगता ही है।
36 घंटे का व्रत — शरीर का भी ध्यान रखिए
अब वह हिस्सा जिस पर श्रद्धा वाले लेख अक्सर चुप रह जाते हैं। पर यह चुप्पी ठीक नहीं, क्योंकि छठ का व्रत सचमुच कठिन है — और इसे निभाने वाली को अपने शरीर की भी उतनी ही फ़िक्र होनी चाहिए जितनी संकल्प की।
ये बातें ध्यान में रखिए
- खरना की खीर से पहले भरपूर पानी — नहाय-खाय के दिन और खरना की सुबह तक ख़ूब पानी पीजिए। शरीर में जो पानी जाएगा, वही अगले 36 घंटे चलेगा।
- घाट पर ठंडा पानी और लंबा खड़ा रहना — कार्तिक की सुबह पानी बहुत ठंडा होता है। घुटनों और कमर की तकलीफ़ हो तो ज़्यादा देर पानी में मत रहिए; किनारे से भी अर्घ्य दिया जा सकता है।
- चक्कर, धुँधलापन या बहुत कमज़ोरी — तुरंत बैठ जाइए और घरवालों को बताइए। इसे "व्रत की परीक्षा" मत समझिए।
- पारण एकदम से भारी खाना नहीं — पहले जल, फिर अदरक-गुड़, फिर हल्का प्रसाद।
🩺 किन्हें यह व्रत सोच-समझकर रखना चाहिए: गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माएँ, मधुमेह या रक्तचाप की दवा लेने वाले, गुर्दे की समस्या वाले, और बुज़ुर्ग। परंपरा में भी इसका रास्ता है — ऐसे में घर का कोई और सदस्य व्रत रख सकता है, या व्रती फल-जल वाला हल्का व्रत रखकर अर्घ्य दे सकती है। छठी मैया से जो माँगा जाता है वह संतान और परिवार की सलामती है; अपनी सेहत को जोखिम में डालकर वह माँग पूरी नहीं होती। अगर आप किसी बीमारी की दवा पर हैं, तो व्रत से पहले अपने डॉक्टर से एक बार बात ज़रूर कीजिए।
विदेश में छठ — जब घाट सात समंदर पार हो
अगर आप यह न्यू जर्सी, टोरंटो, दुबई, लंदन या सिडनी से पढ़ रही हैं, तो यह हिस्सा आपके लिए है।
पहले वह बात जो सबसे ज़्यादा उलझन पैदा करती है। अर्घ्य हमेशा आपके अपने शहर के सूर्यास्त और सूर्योदय पर दिया जाता है — भारत के समय से नहीं। यह पर्व ही सूरज से बँधा है, घड़ी से नहीं। जब आपके ऊपर का सूरज डूबे, वही आपका संध्या अर्घ्य है।
| शहर | संध्या अर्घ्य — 15 नव सूर्यास्त | उषा अर्घ्य — 16 नव सूर्योदय |
|---|---|---|
| न्यू जर्सी / न्यूयॉर्क | 4:40 शाम | 6:46 सुबह |
| शिकागो, अमेरिका | 4:31 शाम | 6:43 सुबह |
| सैन फ़्रांसिस्को | 5:00 शाम | 6:52 सुबह |
| टोरंटो, कनाडा | 4:54 शाम | 7:14 सुबह |
| लंदन, ब्रिटेन | 4:13 शाम | 7:21 सुबह |
| दुबई, यूएई | 5:33 शाम | 6:38 सुबह |
| दोहा, क़तर | 4:47 शाम | 5:53 सुबह |
| सिंगापुर | 6:52 शाम | 6:49 सुबह |
| सिडनी, ऑस्ट्रेलिया | 7:37 शाम | 5:45 सुबह |
| मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया | 8:10 शाम | 6:01 सुबह |
| टोक्यो, जापान | 4:37 शाम | 6:19 सुबह |
| पोर्ट लुई, मॉरीशस | 6:28 शाम | 5:24 सुबह |
ये समय खगोलीय गणना से निकाले गए हैं। अपने शहर के मौसम-ऐप में उसी तारीख़ का सूर्यास्त-सूर्योदय देखकर एक बार मिला लीजिए। यदि आपका परिवार किसी विशेष पंचांग को मानता है, तो उसी का पालन कीजिए।
पानी कहाँ मिलेगा?
यह सबसे बड़ा सवाल होता है, और इसका जवाब उतना कठिन नहीं जितना लगता है।
अमेरिका और कनाडा में बड़े शहरों के पास पार्क की झीलें सबसे आम विकल्प हैं — न्यू जर्सी के डॉनल्डसन पार्क में तो हर साल सैकड़ों परिवार जुटते हैं, और शिकागो, कैलिफ़ोर्निया व नॉर्थ कैरोलाइना में भी संगठित आयोजन होते हैं। ब्रिटेन और कनाडा में स्थानीय पार्क की झीलें अस्थायी घाट बन जाती हैं।
और जहाँ खुला पानी है ही नहीं — जैसे दोहा या अबू धाबी में — वहाँ लोग घर के आँगन, बालकनी या छत पर बड़े टब में साफ़ पानी भरकर अर्घ्य देते हैं। कहीं-कहीं स्विमिंग पूल का इस्तेमाल होता है। परंपरा इसे स्वीकार करती है, क्योंकि अर्घ्य का असली तत्व पानी की मात्रा नहीं, सूर्य के सामने खड़े होने का संकल्प है।
📍 विदेश में जाने से पहले तीन बातें: पहली, कई देशों में सार्वजनिक झील या तालाब में उतरने के नियम होते हैं — स्थानीय पार्क अथॉरिटी से पहले पूछ लीजिए, कई जगह छठ के लिए अनुमति मिल जाती है। दूसरी, नवंबर में उत्तरी गोलार्ध का पानी बहुत ठंडा होता है, इसलिए बच्चों और बुज़ुर्गों को पानी में मत उतारिए। तीसरी, प्रसाद और फल पानी में मत छोड़िए — बटोरकर वापस लाइए। यह हमारे पर्व का अपना नियम भी है।
सामग्री कहाँ से मिलेगी?
बाँस का सूप और दउरा अब अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और खाड़ी देशों की भारतीय दुकानों में मिल जाते हैं, और ऑनलाइन भी। जो न मिले, उसका रास्ता यह है:
- बाँस का सूप न मिले तो बेंत की गोल टोकरी चलेगी — शर्त सिर्फ़ यह कि वह प्राकृतिक रेशे की हो, प्लास्टिक की नहीं।
- गन्ना न मिले तो कई परिवार लंबी गन्ने की डंडी की जगह मौसमी फल बढ़ा देते हैं। लातिन अमेरिकी दुकानों में अक्सर गन्ना मिल जाता है।
- ठेकुआ घर पर ही बनाइए — गेहूँ का आटा, गुड़ और घी हर जगह मिलता है। साँचा न हो तो काँटे से डिज़ाइन बना लीजिए; स्वाद वही रहेगा।
- मिट्टी के दीये न मिलें तो पीतल या स्टील के दीये चलेंगे। मोमबत्ती से बचिए।
अपने बच्चों को यह पर्व कैसे समझाएँ
विदेश में छठ पर आप जो सबसे क़ीमती काम कर सकती हैं, शायद यही है।
शिकागो या सिडनी में पल रहा आपका बेटा या बेटी इसे वैसे नहीं सीखेगा जैसे आपने सीखा था — घाट की भीड़ से, गली भर की तैयारी से, बड़ी माँ के गीतों से। अगर यह उस तक पहुँचनी है, तो आपसे ही पहुँचेगी।
तो उसे नियम मत गिनाइए। उसे यह बताइए कि दुनिया में एक ऐसा त्योहार है जो पहले डूबते सूरज को धन्यवाद कहता है। यह बात किसी भी उम्र के बच्चे को समझ आ जाती है — कि जो चीज़ जा रही है, उसका शुक्रिया पहले।
अगर वह पहले से करवा चौथ जानती है, तो फ़र्क बताइए — करवा चौथ में चाँद का इंतज़ार होता है, छठ में सूरज का; वह पति के लिए है, यह संतान के लिए।
उसे यह भी बताइए कि इस पूजा में कोई पंडित नहीं होता, कोई मूर्ति नहीं होती, और घाट पर अमीर-ग़रीब एक ही पानी में खड़े होते हैं। जो बच्चा बाहर के देश में समानता की भाषा रोज़ सुनता है, उसे यह जानकर अच्छा लगेगा कि उसकी अपनी परंपरा में यह बात सदियों से है।
और सबसे बड़ी बात — उसे काम में शामिल कीजिए। ठेकुआ की लोई उसके हाथ से दबवाइए। सूप में केला उसे रखने दीजिए। थोड़ा आटा गिरने दीजिए। उसे तिथि याद नहीं रहेगी, अर्घ्य का समय याद नहीं रहेगा। उसे यह याद रहेगा कि एक नवंबर की सुबह, अँधेरे में, उसकी माँ उसे एक झील के किनारे ले गई थी — और वहाँ सूरज निकलने पर सब लोग एक साथ चुप हो गए थे।
अगर इस बार आप अकेली हैं, आसपास कोई छठ नहीं कर रहा — तो याद रखिए कि इस पर्व को कभी भीड़ की ज़रूरत नहीं रही। न मंदिर चाहिए, न पुरोहित, न किसी की अनुमति। बस साफ़ पानी, एक सूप, और वह सूरज जो हर देश में एक ही है। आपकी छत पर भी वही डूबता है जो पटना के गंगा घाट पर।
गीत — जिनके बिना छठ अधूरा है
छठ की सबसे बड़ी पहचान इसके गीत हैं। भोजपुरी, मैथिली और मगही में गाए जाने वाले ये गीत किसी ग्रंथ में नहीं लिखे — ये माँ से बेटी तक, सास से बहू तक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर आए हैं।
इनमें छठी मैया से बात की जाती है, बहुत अपनेपन से — कभी शिकायत, कभी मनुहार, कभी अपने घर की बात। और इन गीतों की एक ख़ास बात यह है कि इनमें सूरज को "देव" से ज़्यादा "अपना" कहा गया है।
विदेश में बसे परिवारों के लिए ये गीत और भी कुछ बन गए हैं। दोहा की छत पर टब में खड़ी व्रती मोबाइल पर वही गीत चला लेती है जो उसकी नानी आँगन में गाती थीं। घाट बदल गया, पानी बदल गया, देश बदल गया — आवाज़ वही है।
चैती छठ — साल में दो बार
बहुत कम लोग जानते हैं कि छठ साल में दो बार होता है। कार्तिक वाला छठ बड़ा और प्रसिद्ध है, पर चैत्र महीने में — मार्च-अप्रैल में — चैती छठ भी होता है, ठीक उसी विधि से।
चैती छठ में भीड़ कम होती है और ज़्यादातर वही परिवार करते हैं जिनकी कोई ख़ास मन्नत हो। गर्मी की शुरुआत होने से यह शरीर पर और भारी पड़ता है, इसलिए इसे कठिन माना जाता है।
आख़िर में
जो जा रहा है, उसका आभार पहले
छठ की सारी विधि, सारी सामग्री, चारों दिन का सारा अनुशासन — इन सबके नीचे एक ही विचार बैठा है। हम उसे भी प्रणाम करेंगे जो ढल रहा है, क्योंकि उसी ने हमें दिनभर रखा। और हम भरोसा रखेंगे कि वह लौटेगा। यही भरोसा उन छत्तीस घंटों को संभव बनाता है, और यही भरोसा उस माँ को सात समंदर पार भी अँधेरे में झील के किनारे खींच लाता है। 🌅
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — FAQs
छठ पूजा 2026 में कब है?
छठ पूजा क्यों मनाई जाती है?
छठी मैया कौन हैं?
छठ का व्रत कितने घंटे का होता है?
छठ पूजा की सामग्री में क्या-क्या लगता है?
ठेकुआ कैसे बनता है?
क्या छठ का व्रत सिर्फ़ महिलाएँ रखती हैं?
छठ में पहले डूबते सूरज को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
विदेश में छठ पूजा कैसे करें?
गर्भवती महिलाएँ या बीमार लोग छठ का व्रत रख सकते हैं?
व्रत का पारण कैसे किया जाता है?
चैती छठ और कार्तिक छठ में क्या अंतर है?
📖 एक विनम्र नोट: छठ की परंपराएँ क्षेत्र, गाँव और परिवार के अनुसार थोड़ी-बहुत अलग होती हैं — कहीं कोसी आँगन में भरी जाती है, कहीं घाट पर; कहीं सूप की संख्या अलग होती है। यहाँ जो लिखा गया है वह सबसे प्रचलित परंपरा है। आपके घर की जो रीत है, वही आपके लिए सही है। तिथि और अर्घ्य के समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग से एक बार मिलान अवश्य कर लीजिए।